चर्चित आईबिस त्रयी का आखिरी उपन्यास यह सन 1839 है । ब्रिटेन चीन पर हमले की तैयारी कर रहा है , जिसके अफ़ीम के कारोबार को पिछले साल बीजिंग ने रोक दिया था । हवलदार केसरी अपने कप्तान नेविल मी के साथ कलकत्ता की ओर बढ़ रहे हैं , ताकि वे आने वाली जंग में भारतीय स्वयंसेवकों की पलटन का नेतृत्व कर सकें । हांगकांग में रहस्यमय हालात में अपने अफीम व्यापारी पति की मौत के बाद मुंबई की शीरीं मोदी को अब अकेले ही चीन का सफर करना है ताकि वे अपने धन और अपनी प्रतिष्ठा पर दावा ठोक सकें । कैंटन में नील जितना ही चीज़ों को देखता है उतना ही चिंतित होता जाता है क्योंकि ब्रिटेन के साथ एक आधुनिक युद्ध में टक्कर देने के लिए चीन के पास न तो जहाज़ हैं और न ही वैसे हथियार । भविष्य साफ नज़र आ रहा है , लेकिन क्या चीनी इसे जानते हैं ? इतिहास की बारीक समझ को कौतूहल , उत्तेजना और रोमांच से भरी किस्सागोई के साथ मिलाते हुए अग्निवर्षा एक मास्टरपीस से कम नहीं है । आइबिस त्रयी के इस तीसरे और आखिरी भाग में अमिताभ घोष अपने लेखन के शिखर पर हैं । इक्कीसवीं सदी के कथा साहित्य का एक मास्टरपीस ' लिटररी रिव्यू ' किस्सागोई का शिखर ' द हिंदू